TATTI

टट्टी कितनी अभागी है, कितनी झुठलाई हुई है, पर टट्टी कितना कुछ अपने में समेटे हुए है — हमारी गंदगी, हमारी बीमारियों की पहचान, हमारी बाथरूम की चार दीवारी में गढ़े हुए अरमान। और जैसा कि मेरी माता जी अपने BTC की परीक्षा के लिए याद करते हुए, मुझे भी याद करा दिया था — एक ग्राम मल में होते हैं — कुछ एक लाख जीवाणु, 10,000 विषाणु, 1,000 परजीवी सिस्ट और 100 अंडे।
ख़ैर।
टट्टी — कोई सुबह जाता है, कोई शाम में ‘फ्रेश होना’ पसंद करता है, कोई बस यूँ ही टट्टी जाना पसंद करता है। टट्टी को करने के तरीके बदलते रहे हैं, टट्टी भी बदलती रही है — रोटी, सब्ज़ी, चावल, दाल वाली टट्टी; बर्गर, पिज़्ज़ा, पेप्सी वाली टट्टी।
यद्यपि टट्टी एक सामूहिक प्रयास भी रहा है — समाज को जोड़ने वाला, समाज को बिखेरने वाला भी।
गाँव में जब मैं रहता था, पिंटू चाचा के संग टट्टी करने जाना एक एडवेंचर होता था। भोजपुरी गीत जिस चीज़ के लिए प्रधानवा के अरहर को याद करते हैं, उसके अलावा भी उनका बहुत प्रयोग होता है। खुले नीले आसमान में, अरहर के जंगल में, शर्म-लाज को धत्ता बता के, मैं और पिंटू चाचा, मल का त्याग करते थे।
पिंटू चाचा थोड़े शर्मीले थे। वे पूर्ण रूप से निर्लज्ज होना पसंद नहीं करते थे, तो अपनी पैंट को घुटने तक ही रोककर कार्यक्रम शुरू कर देते थे। मैं आज़ादी में भरोसा रखता हूँ — पैंट को उतारकर, उसे अरहर की एक डाल पर टांग देता था। अब तो बाथरूम VIP हो गए हैं, हर चीज़ ऑर्गेनिक हो गई है, पर वो अरहर की डाल पहली ऑर्गेनिक हैंगर थी।
मुझे याद नहीं हम (मैं और पिंटू चाचा) क्या बतियाते थे, पर होती थी कुछ बात। टट्टी करते वक़्त कौन ही बतियाता है, मर्दे? कभी-कभी टट्टी पार्टी में और लोग भी जुड़ जाते थे। आजकल सुट्टा कल्चर ही टट्टी को बाहर निकालता है — दो कश अंदर जाता है, दो ग्राम बाहर आता है।
ख़ैर। शाम में एक बड़ी टट्टी पार्टी भी निकलती हुई दिखती थी — वो हरिजन बस्ती (चमरौटी) की होती थी, हम उसमें सम्मिलित नहीं हो सकते थे। टट्टी पार्टी में भी जाति का ख़ास ख़याल रखा जाता है। जाति है कि जाती नहीं है। शायद, जाति पेचिश वाली टट्टी की तरह है — ऐसा लगता है कि टट्टी चली गई, पर ससुरी अभी आई ही नहीं है। लगे रहो।
ख़ैर। टट्टी पार्टी के कई औज़ार हुआ करते थे। 2 लीटर की बोतल को ब्रह्मास्त्र की उपाधि प्राप्त थी; सवा और एक लीटर वाले छोटे अस्त्र थे। और एक लोटा — जिसका हो जाता था, वो नितांम्बो पर अन्याय था। सबसे अच्छा सीज़न ब्याह का होता था — नए-नए पेप्सी के बोतल का आगमन। ड्रम में डाला, बर्फ़ से ठंडा किया और उसे बुलाते भी “ठंडा” थे। कोल्ड ड्रिंक बुलाने में असका (आलस) लगती थी।
पिंटू चाचा इस हथियार को नींबू के पेड़ के मायाजाल में संरक्षित करते थे, और सरकारी नल का बगल पता होता था इस हथियार का। सरकारी नल अब गाँव में निष्क्रिय है। वो सरकार की मौजूदगी का एहसास दिलाते थे, शायद इसलिए ही सरकार ने अब शौचालय बनवाकर उन पर स्वामी का नाम पुतवा दिया है। मालिक हैं वो लोकतंत्र के — मौजूदगी ज़रूरी है।
ख़ैर। महिलाओं की दुनिया में भी टट्टी पार्टी का मोल होता था। गाँव की बहुत सारी औरतों का जीवन — गाँव में रहकर भी — फलाने की बहू, फलाने की माई, फलाने गाँव की। उदाहरण के तौर पर, मेरे गाँव की एक महिला का नाम “सेहराई” है, क्योंकि मान्यता है कि वह शहर से आई हैं। मेरी एक दादी हैं — उनका नाम “नौका (नया)” बस इसलिए है क्योंकि बाबा की मृत पुरानी पत्नी को इन्होंने रिप्लेस किया। शायद अंग्रेज़ी में इसे ही Objectification of Women कहते हैं (औरत को वस्तु मान लेना)।
ख़ैर। उन्हें कौन बताए यह, और क्या वे यह सुनेंगी? ख़ैर। शायद टट्टी पार्टी महिलाओं को अपनी पहचान दोबारा परिभाषित करने का एक मौका होता होगा — जहाँ वे फलाने की न होकर, ख़ुद होती थीं। नहीं पता मुझे।
बस टूटी सड़क के किनारे, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर टट्टी के पहाड़ — मौजूदगी की गवाही देते थे। बाक़ी इतिहास है। और इस इतिहास को ना कोई लिखेगा, ना कोई इस पर लड़ेगा।
ख़ैर। अब टट्टी बदल रही है, टट्टी का तरीका बदल रहा है, टट्टी रियल है। पर क्या मेरे फोन पर आने वाली रील भी रियल है? अंबानी हो या अलहुआ, रोडीज़ हो चाहे मोदी, ट्रंप हो चाहे तेंदुलकर — टट्टी तो सब करते हैं, पर टट्टी की बतिया कौन करता है?