ये कोई रंडीख़ाना है?
मेरे मित्र की नज़र एक मादा पर पड़ी—वह बत्तीस की थी, यौवन से लबरेज़। मर्द समाज सिर्फ़ छाती का माप और तशरीफ़ की circumference से target acquire कर लेता है।...

रंडी एक हिंदी शब्द है, जिसमें अंग्रेज़ी का RUN आता है, पर एक रंडी की ज़िंदगी दौड़ती नहीं है। वह तो रुके हुए पानी की तरह सड़ रही होती है। इन्हें अंग्रेज़ी में प्रेम से WHO-re बुलाते हैं,शायद यह शब्द पूछता है कि ,“ये कौन हैं????" समाज इन्हें गन्दगी मानता है, पर यह समाज कौन है? कहाँ मिलता है यह ?
भारत के प्रसिद्ध राज्य हरियाणा का गुड़गाँव—जो इस युग में गुरुग्राम के नाम से विख्यात है—वहाँ एक सिकंदरपुर नामक स्थान रंगीन रातें देने के लिए कुख्यात है। धरती की अप्सराएँ वहाँ जिस्म की नीलामी करती हैं। उनकी नीलामी करने से समाज शर्मिंदा है, पर ख़रीदार भी तो हैं। उन पर कौन ग़ौर फ़रमाएगा? सिकंदरपुर पर Chill-Po मची रहती है। गुरुग्राम लोगों को काम और 'काम' दोनों देने में सक्षम है। Market forces यहाँ अपना नग्न-नृत्य दिखाने के लिए आज़ाद हैं।
दिहाड़ी महीने के अंत में आती है, पर खाची भर के lauda-lehsun और tension मिल जाती है। इन शब्दों से शर्मिंदा न हों—यह एक अशुद्ध प्रयाग है; आजकल कोई प्रयाग शुद्ध है क्या? शरीर का बाज़ार रात में लगता है। दिन-दहाड़े शर्म नहीं आती—बस खरीदार अपने-अपने कोठे पर होते हैं, खुद को बेचकर मज़दूरी कमा रहे होते हैं।
मेरे एक मित्र, जो अपने कोठे पर सुबह नौ से शाम पाँच रहते हैं, जीवन के उतार-चढ़ाव से गुज़र रहे हैं। महिला जीवन में रहे तो आनंदा चली जाए तब भी आनंद रहता है। पर मर्द समाज कुंठित रहता है, क्योंकि मन तो cigarette, दारु और दुनिया भर के कबाड़ से भर जाता है, पर आलिंगन की भूख नहीं मिटती। यह prime और primal urge है। पता नहीं यह नर क्या खोज रहा होता है, क्या पाना चाहता है।
मैंने सुना है कि Western Ghats की पहाड़ियों में एक दुर्लभ Torrent Frog की प्रजाति मिलती है, जो नृत्य करके मादा को रिझाता है और उससे पहले बाक़ी नर को द्वंद-युद्ध में हराता है। क्या नियम होते होंगे उस युद्ध के? क्या शंखनाद “tarr tarr” की आवाज़ से होता होगा?मर्द समाज भी यह सब कर सकता है, पर ससुरा competition ज़्यादा है। इसलिए गुड़गाँव के ये बाशिंदे पैसे देकर आलिंगन ख़रीदने का प्रयास करते हैं। मेरे मित्र ने भी किया।
Office से आए, तन्हाई से एक युद्ध किया और उठा के पटक दिए गए। फिर क्या? Rapid speed से Rapido पर बैठे और पहुँच गए सिकंदरपुर।वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की अप्सराएँ थीं—कोई सुंदर, कोई कुरूप। वैसे सुंदर और कुरूप होता क्या है? एक बहुत ज़्यादा powder पोते हुए थी; हँसी आ गई मुझे। समाज में औरतें make-up करती हैं और उन्हें लगता है कि यह उनकी aazaadi है। अरे दीदी, यह हम मदों का ही Propaganda है। रंडी को भी यह याद रहता है।
मेरे मित्र की नज़र एक मादा पर पड़ी—वह बत्तीस की थी, यौवन से लबरेज़। मर्द समाज सिर्फ़ छाती का माप और तशरीफ़ की circumference से target acquire कर लेता है। मेरे मित्र उसे अपने flat पर लाए। रंडी लोगों का अपना कोठा होता है, पर हमारे मित्र उसे अपने कोठे पर लाए। Convincing power है उनमें; घमंड खाते हैं इस पर।
जब वह आ गई, तो मित्र लबरेज़ थे। Do shot—मतलब दो बार charm sukh—की बात हुई थी। पैसे देकर बलात्कार करना क़ानूनन रूप से जुर्म नहीं है। मित्र अपने कोठे पर तैयारी में थे, पर कुछ हुआ।वह बतियाने लगी—business नहीं, जीवन के बारे में। अपने पति के बारे में, अपने बच्चे के बारे में, और इस धंधे में अपने vivid experience के बारे में। थोड़ी देर चर्चा हुई। फिर वह कुर्सी से उठकर बिस्तर की ओर बढ़ी और मित्र को आलिंगन के लिए नेवता दिया।
पर मित्र नहीं कर पाए। क्यों? उन्हें नहीं पता।
अब बात पैसों पर आ गई। रंडी का धर्म सिखाता है—paisa pehle, kaam baad mein। मेरे रांड-मित्र इसका उल्टा मानते हैं, पर दुविधा में थे। थोड़ी गहमा-गहमी हुई और फिर मेरे मित्र ने पूरे 700 रुपये देकर अपने पाप धो लिए।अंत में दुख यह रहा कि कुछ किया भी नहीं, पैसे भी गए, और साथ में फ्रिज पर रखे तीन केले भी ले गई।
मित्र ने और भी कारण बताए—कि इन्हें मुँह नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि चुम्बन अनिवार्य है आलिंगन में। अब मित्र नई मादा की खोज में निकले हैं—जो पैसे से नहीं, समय देने से आए। 100–200 ग्राम बातें होंगी, ज़ुकेर्बेर्गवा के इंस्टाग्राम पर।
याद आया—एक बार मेरी महिला मित्र की mata ji ने अपनी ठेठ ब्रज में पूछा था:
“लाली मोये तो समझ ना आयुति, जे प्यार फोन पे होये कैसे जात है।”
एक महापुरुष ने कहा है—“Aadmi chutiya hai, kuch bhi chahta hai.”
पर मेरे मित्र क्या चाहते हैं? और क्यों नहीं हुआ उनसे?